गणेश और परशुराम की कहानी: वह दिन जब एक हथियार ने खुद को कोसा
मुझे आज भी वह पल याद है — जब शिव के हाथों की गर्मी छोड़कर मैं पहली बार किसी और…
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मुझे आज भी वह पल याद है — जब शिव के हाथों की गर्मी छोड़कर मैं पहली बार किसी और…
कैलाश पर्वत के उत्तरी द्वार के पास एक छोटा सा हाथी का बच्चा हर शाम अकेला खड़ा रहता था। उसकी…
मेरे पैरों में कोई खराबी नहीं थी। समस्या ये थी कि मुझे पता ही नहीं चलता था कि वो कब,…
मोर की साँसें उखड़ रही थीं। कार्तिकेय ने उसकी गर्दन पर हाथ फेरा और कैलाश की चोटी को दूर से…
रात के पौने दो बजे मीरा की आँख खुली, और पहला ख़याल दिमाग़ में यही आया — बिस्तर पर वो…
द्वार पर खड़े उस बालक को नहीं पता था कि वह जिस आदमी को अंदर जाने से रोक रहा है,…
मुझे आज भी वह पल याद है — जब शिव के हाथों की गर्मी छोड़कर मैं पहली बार किसी और की मुट्ठी में बंधा। मैं परशु हूँ। एक फरसा, जिसे शिव ने अपने ही तप से गढ़ा था। और यह गणेश परशुराम की कहानी है, जिसे मैंने अपनी धार पर लिखा है — किसी स्याही से नहीं, खून की एक बूँद से। जब शिव ने मुझे परशुराम की हथेली में रखा परशुराम मेरे लिए किसी योद्धा से कम नहीं थे। उन्होंने मुझसे धरती को क्षत्रियों के अभिमान से मुक्त किया था, इक्कीस बार, बिना थके। हर वार के बाद वे…
मेरे पैरों में कोई खराबी नहीं थी। समस्या ये थी कि मुझे पता ही नहीं चलता था कि…
मोर की साँसें उखड़ रही थीं। कार्तिकेय ने उसकी गर्दन पर हाथ फेरा और कैलाश की चोटी को…
राष्ट्रपति भवन के उस कमरे में फूलों की खुशबू भर गई थी। सामने कुछ छात्र खड़े थे, हाथों में सजा हुआ हार, चेहरों पर वह…
बेजवाड़ा, 31 मार्च 1921। कांग्रेस अधिवेशन का मैदान लालटेनों की रोशनी में डूबा था, जब गांधी ने एक दुबले-पतले आदमी को अपने पास बुलाया और…
बत्तीस साल की उम्र में बोमन ईरानी के पास एक दुकान थी, एक घुटन थी, और एक सवाल जो उन्हें रोज़ सुबह उठाता था —…
नवंबर 1965, गाँव जगराओं, ज़िला लुधियाना, पंजाब। रात के आठ बजे। चूल्हे पर तवा गरम था। हरनाम कौर ने आटे की लोई हाथ में उठाई…
बारिश उस सुबह ऐसे गिर रही थी जैसे पूरा गांव भीतर से रो रहा हो। स्कूल के बरामदे में तीस-चालीस…
रात के किसी पहर में बारिश रुकी थी, और अब सिर्फ़ छप्पर से बूँदें टपक रही थीं — एक, फिर…
सुबह छह बजे महेश की आँख खुली तो सबसे पहले उसके दाहिने हाथ ने काँपना शुरू किया। ये कोई नई…
बैग पर अब भी एक कार्टून मछली बनी थी, जिसका एक पंख धुलते-धुलते फीका पड़ गया था। मीरा कुछ देर…
मोम अभी नरम था जब कर्णावती ने उंगली से उसे थाम लिया — जलता हुआ, फिर भी उसने हाथ नहीं हटाया। रेशम के एक पतले धागे पर वह मुहर लगा रही थी, और हर बूंद के साथ एक सवाल उसके भीतर गहरा होता जा रहा था: क्या सरहद पार बैठा एक अजनबी, जिसका मज़हब अलग था, जिसका खून अलग था, एक स्त्री के भेजे धागे को भाई की तरह निभाएगा? रानी कर्णावती और हुमायूँ की कहानी यहीं से शुरू होती है — युद्ध के मैदान में नहीं, एक अंधेरे कक्ष में, एक अकेली रानी की मेज़ पर। चित्तौड़ की दीवारों…
बेजवाड़ा, 31 मार्च 1921। कांग्रेस अधिवेशन का मैदान लालटेनों की रोशनी में डूबा था, जब गांधी ने एक…
21 जुलाई 1947 की रात, दिल्ली के एक कमरे में सिर्फ़ एक टेबल लैंप जल रहा था। उसकी…
कैलाश पर्वत के उत्तरी द्वार के पास एक छोटा सा हाथी का बच्चा हर शाम अकेला खड़ा रहता था। उसकी सूंड हवा में इधर-उधर घूमती,…
सुबह अभी पूरी तरह खुली भी नहीं थी कि यशोदा मैया ने फैसला कर लिया — आज मटकी ज़मीन पर नहीं रहेगी। कल रात उन्होंने…
हौज के किनारे एक बड़ा काला कौआ बैठा था। उसका नाम था कालू। और कालू को पानी पीने का बड़ा अजीब तरीका था — वो…
बारिश होने से पहले का वो वक्त होता है ना — जब हवा थोड़ी ठंडी हो जाती है और आसमान का रंग बदलने लगता है…
काशी के घाटों पर शाम उतर रही थी जब सेठ धनराज शर्मा ने अपने नौकर से कहा — “रथ रोको।”…
रात के तीसरे पहर में राजा विक्रमादित्य ने अपना मुकुट उतारा, अपनी अंगूठियाँ उतारीं, और एक फटी हुई चादर ओढ़…
पहले दिन वो सिक्का मिट्टी से ऐसे निकला जैसे कोई आलू निकलता है। हलधर की कुदाल टकराई, एक खनखनाहट हुई…
जंगल के उस कोने में कोई नहीं आता था जहाँ हरिया लकड़ी काटने जाता था। पेड़ वहाँ टेढ़े-मेढ़े थे, ज़मीन…
रात के पौने दो बजे मीरा की आँख खुली, और पहला ख़याल दिमाग़ में यही आया — बिस्तर पर वो अकेली क्यों तिरछी सोई है? फिर याद आया। कोई और सिरा अब भरा नहीं जाना था। ये तलाक के बाद की कहानी का पहला हफ़्ता था, और मीरा अब भी अपने शरीर को समझा रही थी कि जगह पूरी उसकी है — फिर भी वो हर रात बिस्तर के बाएँ किनारे पर, उसी पुरानी जगह पर सिमटकर सोती। तेरह साल की आदत एक कोर्ट के फ़ैसले से नहीं टूटती। पुणे के इस दो-कमरे के फ्लैट में अब सिर्फ़ उसकी आवाज़…
लैपटॉप की स्क्रीन नीली चमक रही थी, लेकिन अर्जुन की उंगलियां कीबोर्ड से दस मिनट पहले ही रुक…
रजीव मल्होत्रा ने क्लासरूम के दरवाज़े की कुंडी पर हाथ रखा, और फिर हाथ वापस खींच लिया। अंदर…
सुबह के पौने आठ बजे थे जब हवलदार विक्रम ने डाक की उस थैली से भूरे रंग का एक छोटा पार्सल निकाला। नाम पढ़ते ही…
अलमारी के सबसे ऊपर वाले खाने में वीवान को वो डिब्बा मिला, जो पिछले साल भी वहीं रखा था — प्लास्टिक का पुराना डिब्बा, जिस…
सुधीर के फ़ोन में एक स्क्रीनशॉट है जो उसने आज तक किसी को नहीं दिखाया। तारीख़ — 14 जुलाई 2025, रात 11:42 बजे। यह उसी…
बारिश उस सुबह ऐसे गिर रही थी जैसे पूरा गांव भीतर से रो रहा हो। स्कूल के बरामदे में तीस-चालीस लोग खड़े थे, सब काले…
क्या आपने कभी सोचा है कि जब समंदर की लहरें और जंगल की खामोशी आपस में टकराती हैं, तो वहां…
“क्या आपने कभी महसूस किया है कि आपकी ज़िंदगी एक रेस है? एक ऐसी रेस, जिसमें हर कदम पर चुनौतियाँ…
क्या आपने कभी सोचा है कि एक युवा, जिसने बचपन में हर बात पर सवाल उठाए, हर परंपरा को चुनौती…
एक शाम, महाराष्ट्र के सह्याद्रि पहाड़ों की गोद में बसे एक छोटे से गाँव में, दादाजी कोंडदेव अपने पोते के…
अठारहवें दिन की शाम को, जब युद्ध समाप्त हो चुका था, गांधारी ने पहली बार अपनी आँखों की पट्टी खोली। एकतीस वर्ष। एकतीस वर्ष से उसकी आँखें इस पट्टी के पीछे बंद थीं। पट्टी जिसे उसने गांधार में अपने विवाह की रात, अपने हाथों से बाँधा था। रेशमी कपड़े की वो पट्टी — जो प्रेम थी, जो प्रतिज्ञा थी, जो उसने सोचा था कि पुण्य है। रोशनी आँखों में चुभी। जैसे किसी ने लोहे की सुई चुभो दी हो। और फिर उसने देखा। कुरुक्षेत्र का वो मैदान जो अब कब्रिस्तान था। दुर्योधन — उसका पहलौठा बेटा — जमीन पर पड़ा…